भारतीय राजनीति में अक्सर पक्ष और विपक्ष के सुर एक-दूसरे के खिलाफ ही सुनाई देते हैं। लेकिन जब बात राष्ट्र की सुरक्षा और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी की हो, तो कभी-कभी राजनीतिक दीवारें गिर जाती हैं। हाल ही में, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने कुछ ऐसा ही किया है। उन्होंने पाकिस्तान को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के रुख का न केवल समर्थन किया है, बल्कि पाकिस्तान को एक सख्त चेतावनी भी दी है। यह खबर सामान्य नहीं है; यह भारतीय विदेश नीति के उस अध्याय पर मुहर लगाती है जहाँ ‘आतंक’ और ‘बातचीत’ के बीच एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है।
आइए, एक खोजी पत्रकार की नज़र से इस पूरे घटनाक्रम, इसके कूटनीतिक मायनों और भारत-पाक रिश्तों के भविष्य की गहराई से पड़ताल करते हैं।
थरूर का बयान: राजनीति से ऊपर राष्ट्रनीति
शशि थरूर, जो अपनी बेबाक राय और सरकार की आलोचना के लिए जाने जाते हैं, ने इस बार एक अलग ही राग छेड़ा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान के साथ तब तक कोई सार्थक बातचीत नहीं हो सकती जब तक वह अपनी जमीन से भारत के खिलाफ चलने वाले आतंकवाद को पूरी तरह से खत्म नहीं कर देता।
महत्वपूर्ण बिंदु: शशि थरूर का यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि वह खुद संयुक्त राष्ट्र में एक लंबा अनुभव रखते हैं। उनका समर्थन करना यह सिद्ध करता है कि मोदी सरकार की ‘नो टॉक्स विद टेरर’ (No Talks With Terror) की नीति केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक आवश्यकता है।
थरूर ने माना कि भारत सरकार का यह स्टैंड बिल्कुल सही है कि ‘आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते’। यह वही लाइन है जिसे नई दिल्ली ने पिछले एक दशक से सख्ती से पकड़ रखा है। उरी और पुलवामा के बाद से भारत ने जो रणनीतिक बदलाव किया है, उसे अब विपक्ष के एक प्रमुख चेहरे का भी समर्थन मिल गया है।
पाकिस्तान का दोहरा चरित्र और भारत की सतर्कता
थरूर ने चेताया है कि हमें पाकिस्तान के हालिया बयानों या ‘शांति प्रस्तावों’ से भ्रमित नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान इस समय अपनी इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। वहाँ की अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर है, और राजनीतिक अस्थिरता चरम पर है। ऐसे में, अगर पाकिस्तान बातचीत की पेशकश करता भी है, तो वह मजबूरी का सौदा है, नीयत का बदलाव नहीं।
महत्वपूर्ण बिंदु: इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, पाकिस्तान ने पीठ में खंजर घोंपा है। चाहे वह वाजपेयी जी की बस यात्रा के बाद कारगिल हो, या मोदी जी की लाहौर यात्रा के बाद पठानकोट। थरूर का इशारा इसी ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (विश्वास की कमी) की ओर है।
थरूर ने साफ किया कि कूटनीतिक चैनल खुले रखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम उच्च स्तरीय द्विपक्षीय वार्ता शुरू कर दें। उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक का उदाहरण देते हुए कहा कि बहुपक्षीय मंचों पर भागीदारी एक मजबूरी और जिम्मेदारी है, लेकिन द्विपक्षीय प्रेम-मिलाप अभी कोसों दूर है।
मोदी सरकार की विदेश नीति: ‘आयरन फिस्ट’ (लौह मुक्का)
2014 के बाद से भारत की पाकिस्तान नीति में एक बुनियादी बदलाव आया है। पहले की सरकारें मानती थीं कि ‘बातचीत ही एकमात्र रास्ता है’। लेकिन मोदी सरकार ने इस सिद्धांत को पलट दिया है। नई नीति है—’आतंकवाद की कीमत चुकाए बिना बातचीत नहीं होगी’।
पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने की रणनीति (Diplomatic Isolation) काफी हद तक सफल रही है। आज पाकिस्तान की बात सुनने वाला कोई नहीं है, सिवाय चीन के। अमेरिका, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश, जो कभी पाकिस्तान के पारंपरिक मित्र थे, आज भारत के साथ खड़े हैं। शशि थरूर जैसे अनुभवी राजनयिक का इस नीति का समर्थन करना, सरकार की इस रणनीति की वैधता को और मजबूत करता है।
क्यों खास है शशि थरूर का यह रुख?
कांग्रेस पार्टी अक्सर सरकार की विदेश नीति, खासकर चीन के मुद्दे पर, सवाल उठाती रहती है। लेकिन पाकिस्तान के मुद्दे पर थरूर का यह बयान कांग्रेस के भीतर भी एक नई बहस को जन्म दे सकता है।
- राजनयिक अनुभव: थरूर जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में पाकिस्तान की क्या छवि है। वह जानते हैं कि बिना ठोस सबूत और कार्रवाई के पाकिस्तान पर भरोसा करना आत्मघाती होगा।
- वोट बैंक की राजनीति से परे: अक्सर आरोप लगते हैं कि पार्टियाँ तुष्टिकरण के लिए नरम रुख अपनाती हैं, लेकिन थरूर ने यहाँ कठोर यथार्थवाद (Hard Realism) का परिचय दिया है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: यह बयान संदेश देता है कि जब बात देश की सुरक्षा की आती है, तो भारत एक सुर में बोलता है।
महत्वपूर्ण बिंदु: पाकिस्तान की सेना (Pak Army) का अस्तित्व ही ‘भारत विरोध’ पर टिका है। थरूर ने इशारों में यह भी समझा दिया कि जब तक रावलपिंडी (सेना मुख्यालय) अपनी नीति नहीं बदलता, इस्लामाबाद (सरकार) से बात करने का कोई फायदा नहीं है।
26/11: वह घाव जो कभी नहीं भरा
बातचीत क्यों नहीं हो सकती? इसका जवाब मुंबई की सड़कों पर आज भी गूंजता है। 26/11 के हमले भारत की आत्मा पर एक ऐसा घाव हैं जिसे कूटनीति की मीठी बातों से नहीं भरा जा सकता। थरूर ने अपने बयान में इस बात को रेखांकित किया कि न्याय अभी तक नहीं मिला है। हमले के साजिशकर्ता पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं।
जब तक हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, भारत का कोई भी प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ चाय की चुस्कियां नहीं ले सकता। यह जनभावना है, और थरूर ने इसी नब्ज को पकड़ा है।
पाकिस्तान की मजबूरी: ‘भूखे भजन न होय गोपाला’
आज पाकिस्तान बातचीत के लिए क्यों गिड़गिड़ा रहा है? इसलिए नहीं कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि उनके पास आटा खरीदने के पैसे नहीं हैं।
- महंगाई: पाकिस्तान में महंगाई दर आसमान छू रही है।
- कर्ज: देश IMF के टुकड़ों पर पल रहा है।
- अशांति: बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी सेना अपने ही लोगों से लड़ रही है।
थरूर का विश्लेषण कहता है कि भारत को पाकिस्तान की इस कमजोरी का फायदा उठाना चाहिए, न कि पिघल जाना चाहिए। अगर हम अभी बातचीत शुरू कर देंगे, तो यह पाकिस्तान की सेना को एक ‘जीत’ (Win) दे देगा, जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है अपनी जनता को दिखाने के लिए।
SCO और जयशंकर की यात्रा: एक कूटनीतिक संतुलन
हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का पाकिस्तान दौरा भी चर्चा में रहा। यह वर्षों बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री का पाकिस्तान दौरा था। लेकिन सरकार ने, और थरूर ने भी, यह स्पष्ट किया कि यह दौरा द्विपक्षीय नहीं था। यह केवल SCO चार्टर के तहत एक दायित्व था।
महत्वपूर्ण बिंदु: जयशंकर ने इस्लामाबाद की धरती पर खड़े होकर आतंकवाद के खिलाफ जो खरी-खरी सुनाई, उसने साफ कर दिया कि भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक कूटनीति खेल रहा है। थरूर ने इस ‘बारीक लकीर’ (Fine Line) को सही ठहराया है—अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ निभाओ, लेकिन दुश्मन को गले मत लगाओ।
क्या भारत की नीति हमेशा के लिए बदल गई है?
शशि थरूर का बयान इस बात का संकेत है कि भारत की राजनीति में पाकिस्तान को लेकर एक ‘नया सामान्य’ (New Normal) स्थापित हो चुका है। अब कोई भी सरकार, चाहे वह बीजेपी की हो या भविष्य में किसी और की, पाकिस्तान के साथ पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकती।
जनता अब ‘कड़ी निंदा’ से संतुष्ट नहीं होती। उसे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘एयर स्ट्राइक’ जैसी कार्रवाई चाहिए। थरूर जैसे बुद्धिजीवी नेता का इस धारा के साथ बहना बताता है कि भारत का रणनीतिक धैर्य (Strategic Patience) अब समाप्त हो चुका है।
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