भारतीय राजनीति के पन्नों पर अक्सर ऐसे अध्याय जुड़ते हैं, जो न केवल विपक्षी खेमे में हलचल मचाते हैं बल्कि अपनी ही पार्टी की बुनियाद को हिलाने का माद्दा रखते हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। लेकिन इस बार मुद्दा ‘भगवा आतंकवाद’ नहीं, बल्कि ‘भगवा संगठन’ की तारीफ है।
दिग्विजय सिंह, जो अपनी कट्टर RSS विरोधी छवि के लिए पहचाने जाते हैं, ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की संगठनात्मक क्षमता की तारीफ करके सियासी गलियारों में एक नया बवंडर खड़ा कर दिया है। और इस आग में घी डालने का काम किया है पार्टी के दो अन्य वरिष्ठ नेताओं— शशि थरूर और सलमान खुर्शीद के समर्थन ने।
क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पुरानी तस्वीर साझा की। इस तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (अपने युवा दिनों में) भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के चरणों में बैठे नजर आ रहे थे। तस्वीर के साथ दिग्विजय सिंह ने जो लिखा, उसने कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों जगह खलबली मचा दी।
“मैं इस बात का घोर विरोधी हूं, लेकिन हमें उनकी (RSS) संगठनात्मक क्षमता से सीखना चाहिए। कैसे एक जमीनी कार्यकर्ता शीर्ष तक पहुंचता है।”
दिग्विजय सिंह का इशारा साफ था—वे कांग्रेस को यह समझाना चाह रहे थे कि विचारधारा की लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन संगठन को जमीनी स्तर पर कैसे मजबूत किया जाए, यह कला संघ से सीखी जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे RSS की विचारधारा से नफरत करते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली और अनुशासन के कायल हैं।
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थरूर और खुर्शीद: ‘सीखने में क्या बुराई है?’
दिग्विजय सिंह के इस बयान को जहां भाजपा ने ‘कांग्रेस का आत्मसमर्पण’ करार दिया, वहीं कांग्रेस के भीतर भी दो फाड़ नजर आए। लेकिन इस नाजुक मोड़ पर शशि थरूर और सलमान खुर्शीद ढाल बनकर सामने आए।
शशि थरूर, जो अपने बेबाक और तर्कपूर्ण बयानों के लिए जाने जाते हैं, ने दिग्विजय सिंह के तर्क का समर्थन किया। उन्होंने कहा:
“संगठन को मजबूत होना चाहिए, इसमें कोई शक नहीं है। अनुशासन जरूरी है। अगर हम अपने विरोधी की ताकतों को नहीं पहचानेंगे, तो उसे हराएंगे कैसे?”
थरूर का मानना है कि राजनीतिक लड़ाई में विरोधी की खूबियों का विश्लेषण करना कोई गुनाह नहीं है। वहीं, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने दिग्विजय सिंह को कांग्रेस का ‘स्तंभ’ बताते हुए कहा कि उनके बयान को सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
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खुर्शीद ने मीडिया से बातचीत में कहा, “दिग्विजय सिंह जी ने जो कहा, वह एक व्यावहारिक मूल्यांकन (Pragmatic Assessment) है। वे कह रहे हैं कि हमें अपने संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। इसका मतलब यह नहीं कि हम RSS की नफरत वाली विचारधारा को अपना रहे हैं।”
कांग्रेस में ‘आंतरिक कलह’ या ‘वैचारिक मंथन’?
जहां एक तरफ पुराने चावल (दिग्विजय, खुर्शीद, थरूर) इसे ‘रणनीतिक सीख’ मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का एक धड़ा इस बयान से बेहद नाराज है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए साफ कर दिया कि पार्टी का आधिकारिक रुख इससे मेल नहीं खाता।
खेड़ा ने तंज कसते हुए कहा:
“गोडसे के संगठन से गांधी के अनुयायी क्या सीख सकते हैं? नफरत फैलाने के अलावा उनके पास सिखाने को है ही क्या?”
इसी तरह, कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने RSS की तुलना सीधे तौर पर चरमपंथी संगठनों से करते हुए कहा कि नफरत की बुनियाद पर टिके संगठन से कुछ भी सीखने की बात करना ही पाप है। यह स्पष्ट दिखाता है कि कांग्रेस के भीतर ‘व्यावहारिकता बनाम आदर्शवाद’ (Pragmatism vs Idealism) की जंग छिड़ गई है।
भाजपा ने ली चुटकी: ‘भ्रमित है कांग्रेस’
इस पूरे घटनाक्रम पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मजे लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह से भ्रमित है। एक तरफ राहुल गांधी ‘मोहब्बत की दुकान’ खोलने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ उनके मेंटर RSS की तारीफ कर रहे हैं।
भाजपा का कहना है कि दिग्विजय सिंह का यह बयान राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवालिया निशान है। क्या कांग्रेस मान रही है कि उसका मौजूदा संगठनात्मक ढांचा (जो राहुल गांधी के नेतृत्व में काम कर रहा है) नाकाफी है?
दुश्मन से सीखने की कला
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि दिग्विजय सिंह का बयान ‘गलती’ नहीं बल्कि एक ‘सोची-समझी रणनीति’ का हिस्सा हो सकता है। लगातार चुनावी हार झेल रही कांग्रेस के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने कैडर को फिर से खड़ा करे।
दिग्विजय सिंह का यह कहना कि “हमें संगठन बनाना सीखना होगा,” दरअसल कांग्रेस आलाकमान के लिए एक चेतावनी भी है। RSS का मॉडल—जहां प्रचारक अपना पूरा जीवन संगठन को दे देते हैं और बदले में सत्ता के शीर्ष तक पहुंचते हैं—निश्चित रूप से किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक केस स्टडी है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को यह समझा पाएगी कि ‘तरीका’ सीखना है, ‘नीयत’ नहीं? शशि थरूर और खुर्शीद जैसे नेताओं का समर्थन यह बताता है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अब ‘अंध-विरोध’ की बजाय ‘रणनीतिक-विरोध’ की तरफ बढ़ना चाहते हैं।
आगे की राह
दिग्विजय सिंह के इस बयान ने कांग्रेस के लिए एक ‘धर्मसंकट’ खड़ा कर दिया है। अगर वे इस बयान का समर्थन करते हैं, तो उन पर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ या RSS के सामने झुकने का आरोप लगेगा। और अगर वे इसका विरोध करते हैं, तो वे अपनी ही संगठनात्मक कमजोरियों को स्वीकार करने से इनकार करेंगे।
फिलहाल, थरूर और खुर्शीद के समर्थन ने दिग्विजय सिंह को पार्टी के भीतर अलग-थलग पड़ने से बचा लिया है। लेकिन 2024 के बाद की राजनीति में, क्या कांग्रेस अपने संगठन में वह ‘लोहे जैसा अनुशासन’ ला पाएगी जिसकी वकालत दिग्विजय सिंह कर रहे हैं? यह देखना दिलचस्प होगा।
इस पूरे वाकये ने एक बात तो साफ कर दी है—राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता, और कभी-कभी जीतने के लिए दुश्मन की किताब के पन्ने भी पलटने पड़ते हैं।
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